बारह भावना (ब्र० मुक्तयानन्द 'सिंह' कृत)

बारह भावना 

(ब्र० मुक्तयानन्द 'सिंह' कृत)




1. अनित्य 

इन्द्र जाल, नभ नगर सम जग अनित्य ही मान।

धन यौवन तन बंधुजन, जल बुद बुद वत जान॥ १॥


2. अशरण 

सिंह से तो मृग को कोई, चाहे लेय बचाय।

काल ग्रसित इंह जीव को, रक्षा न कोउ सकाय॥ २॥


3. एकत्व 

पुत्र कलत्र के मोह में, करि है पाप अनेक।

तिनका फल यहां नरक में, भोगे आप ही एक॥ ३॥


4. अन्यत्व 

तन धन बद्ध अबद्ध द्रव्य, सभी जीव से भिन्न।

फिर हो उन ही में रमत, माने तिन ही अभिन्न॥ ४॥


5. संसार 

दुखमें जलते जगत में, कैसे कोई सुख पाय?

अंगारों की सेज पर, किम सुख नींद लहाय॥ ५॥


6. अशुचि 

निर्मल है निज आत्मा, महा अशुचि तन जान।

दुर्गन्धित मल मूत्र संघ, इस में रति मत ठान॥ ६॥


7. आस्रव 

शुभ अशुभ नित योग से कर्म बांधता जाय।

अज्ञानी बनता हुआ, दुख चउ गति के पाय॥ ७॥


8. संवर 

निज से निज के शुभ अशुभ, दोनों योग निरोध।

संवर मय निज भाव से, कर्मों को अवरोध॥ ८॥


9. निर्जरा 

पूरब बांधे कर्म जो, भरें तपोबल पाय॥

अविपाक अस निर्जरा, धारे सो शिव जाय॥ ९॥


10. लोक 

अनादि अनन्त छः द्रव्य युत, स्वयं सिद्ध यह लोक।

नचत जीव मोह नाश कर, पहुंचे शिव सिर लोक॥ १०॥

 11. धर्म 

वस्तु स्वभाव ही धर्म है चेत ज्ञान जिय रूप।

 पूर्ण ज्ञान प्रकटित करन, सो सत धर्म स्वरूप॥ ११॥.

 12.दुर्लभ 

धन धान्य आदिक स्वर्ग सुख, सुलभ जगत में जान।

अति दुर्लभ है "सिंह" इहं, पावे केवल ज्ञान॥ १२॥

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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