भाव भीनी वंदना
भाव भीनी वंदना
रचियता — आचार्य श्री तुलसी
तर्ज :— जो व्यथाएं प्रेरणा दें
भाव भीनी वंदना भगवान् चरणों में चढ़ाएं ।
शुद्ध ज्योतिर्मय निरामय रूप अपने आप पायें ॥ (ध्रुव)
ज्ञान से निज को निहारें, दृष्टि से निज को निखारें ।
आचरण की उर्वरा में, लक्ष्य तरुवर लहलहाएं ॥१॥
सत्य में आस्था अचल हो, चित्त संशय से न चल हो ।
सिद्ध कर आत्मानुशान, विजय का संगान गाएं ॥२॥
बिन्दु भी हम सिन्धु भी हैं, भक्त भी भगवान् भी हैं ।
छिन्न कर सब ग्रन्थियों को, सुप्त–मानस को जगाएं ॥३॥
धर्म है समता हमारा, कर्म समतामय हमारा ।
साम्ययोगी बन हृदय में, स्रोत समता का बहाएं ॥४॥
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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