दुःखहरण स्तुति
दुःखहरण स्तुति
श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दुःखहरन तुम्हारा बाना है।
मत मेरी बार अबार करो, मोहि देहु विमल कल्याना है ॥ टेक
त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसों कछु बात न छाना है।
मेरे उर आरत जो वरतै, निहचै सबको तुम जाना है ॥
अवलोक विथा मत मौन गहो, नहिं मेरा कहीं ठिकाना है।
हो राजीवलोचन सोचविमोचन, मैं तुमसों हित ठाना है ॥ १ ॥
सब ग्रन्थनि में निरग्रन्थनि में, निरधार यही गणधार कही।
जिननायक ही सब लायक हैं, सुखदायक छायक ज्ञानमही ॥
यह बात हमारी कान परी, तब आन तुम्हारी सरन गही।
क्यों मेरी बार विलम्ब करो, जिननाथ कहो यह बात सही ॥ २ ॥
कहु को भोग मनोग करो, काहु को स्वर्गविमाना है।
कहु को नागनरेशपती, काहु को ऋद्धि निधाना है ॥
अब मोपर क्यों न कृपा करते, यह क्या अंधेर जमाना है।
इंसाफ करो मत देर करो, सुखवृन्द भजो भगवाना है॥३
खल कर्म मुझे हैरान किया, तब तुमसों आन पुकारा है।
तुमही समरथ न न्याय करो, तब बन्दे का क्या चारा है॥
खल घालक पालक बालका, नृपनीति यही जग सारा है।
तुम नीतिनिपुण त्रैलोकपती, तुमही लगि दौर हमारा है॥४
जबसे तुमसे पहिचान भई, तबसे तुमही को माना है।
तुमरे ही शासन का स्वामी, हमको शरना सरधाना है॥
जिनको तुमरी शरनागत है, तिनसों जमराज डराना है।
यह सुजस तुम्हारे सांचेका, सब गावत वेद पुराना है॥५
जिसने तुमसे दिलदर्द कहा, तिसका तुमने दुख हाना है।
अघ छोटा मोटा नाशि तुरत, सुख दिया तिन्हें मनमाना है॥
पावकसों शीतल नीर किया, औ चीर बढ़ा असमाना है।
भोजन था जिसके पास नहीं, सो किया कुबेर समाना है॥६
चिंतामन पारस कल्पतरु, सुखदायक ये परधाना है।
तब दासन के सब दास यही, हमरे मनमें ठहराना है॥
तुम भक्तन को सुरइन्द्रपती, फिर चक्रपती पद़ पाना है।
क्या बात कहों विस्तार बढ़े, वे पायें मुक्ति ठिकाना है॥७
गति चार चैरासी लाखविषैं, चिन्मूरत मेरा भटका है।
हो दीनबन्धु करुणानिधान, अवलों न मिटा वह खटका है॥
जब जोग मिला शिवसाधन का, तब विघ्न कर्मने हटका है।
तुम विघ्न हमारे दूर करो सुख देहु निराकुल घटका है॥८
गजग्राहग्रसित उद्धार लिया, ज्यों अंजन तस्कर तारा है।
ज्यों सागर गोपदरूप किया, मैना का संकट टारा है॥
ज्यों सूलीतें सिंहासन औ बेड़ी को काट बिडारा है।
त्यौं मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूँ आस तुम्हारा है॥९
ज्यों फाटक टेकत पांव खुला औ, साँप सुमन कर डाला है।
ज्यों खड्ग कुसुमका माल किया, बालकका जहर उतारा है॥
ज्यों सेठ विपत चकचूर पूर, घर लछमीसुख विस्तारा है।
त्यौं मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूँ आस तुम्हारा है॥१०
यद्यपि तुमको रागादि नहीं, यह सत्य सर्वथा जाना है।
चिन्मूरति आप अनन्तगुनी, नित शुद्धदशा शिवथाना है॥
तदपि भक्तन की भीड़ हरो, सुखदेत तिन्हें जु सुहाना है।
यह शक्ति अर्चित तुम्हारीका, क्या पावै पार सयाना है॥११
दुःखखण्डन श्रीमुखमण्डन का, तुमरा पन परम प्रमाना है।
वरदान दया जस कीरत का, तिहुँलोक धुजा फहराना है॥
कमलाधरजी ! कमलाकरजी, करिये कमला अमलाना है।
अब मोरिविथा अवलोकि रमापति, रंच न बार लगाना है॥१२
हो दीनानाथ अनाथ हितू, जन दीन अनाथ पुकारी है।
उदयागत कर्मविपाक हलाहल, मोह विथा विस्तारी है॥
जब जोग मिला शिवसाधन का, तब विघ्न कर्म ने हटका है।
तुम विघ्न हमारे दूर करा,े सुख देहु निराकुल घटका है॥८
गजग्राहग्रसित उद्धार लिया, ज्यों अजन तस्कर तारा है।
ज्यों सागर गोपदरूप किया, मैना का संकट टारा है॥
ज्यों सूली तें सिंहासन औ, बेड़ी को काट बिडारा है।
त्यौं मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूँ आस तुम्हारा है॥९
ज्यों फाटक टेकत पांव खुला औ, साँप सुमन कर डाला है।
ज्यों खड्ग कुसुम का माल किया, बालक का जहर उतारा है॥
ज्यों सेठ विपत चकचूर पूर, घर लक्ष्मीसुख विस्तारा है।
त्यौं मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूँ आस तुम्हारा है॥१०
यद्यपि तुमको रागादि नहीं, यह सत्य सर्वथा जाना है।
चिन्मूरति आप अनन्तगुनी, नित शुद्धदशा शिवथाना है॥
तदपि भक्तन की भीड़ हरो, सुखदेत तिन्हें जु सुहाना है।
यह शक्ति अर्चित तुम्हारी का, क्या पावै पार सयाना है॥११
दुःखखण्डन श्रीमुखमण्डन का, तुमरा पन परम प्रमाना है।
वरदान दया जस कीरत का, तिहुँलोक धुजा फहराना है॥
कमलाधरजी ! कमलाकरजी, करिये कमला अमलाना है।
अब मोरिविथा अवलोकि रमापति, रंच न बार लगाना है॥१२
हो दीनानाथ अनाथ हितू, जन दीन अनाथ पुकारी है।
उदयागत कर्मविपाक हलाहल, मोह विथा विस्तारी है॥
ज्यों आप और भवि जीवन की, तत्काल बिथा निरवारी है।
ज्यों ‘वृन्दावन’ यह अर्ज करे, प्रभु आज हमारी बारी है ॥
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद
Comments
Post a Comment