है अगरचे सुख
भजन-है अगरचे सुख
है अगरचे सुख मुकम्मिल मोक्ष में वैराग में ।
और कषायों के विषय भोगों के बिल्कुल त्याग में ॥
पर हर इक इन्सान में इतनी भला शक्ति कहां ।
सारे कर्मों को जो दे चैलेंज आ वैराग में ॥
गृहस्थ नीति पर चलें बस है सुगम रस्ता यही ।
धीरे धीरे कम करें कर्मों को घर के राग में ॥
त्याग फिर संसार को मुनिपद धरें शिव पद लहें।
सारे कर्मों को जलादे ध्यान तप की आग में ॥
आप खुद करके दिखाया था ऋषभ जिनराज ने ।
किस तरह इन्सां चले इस गृहस्थ में वैराग में ॥
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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