हाय इन भोगों ने
भजन-हाय इन भोगों ने
चाल—घर से यहां कौन खुदा के लिए लाया मुझको ।
हाय इन भोगों ने क्या रंग दिखाया मुझ को
बेखबर जगत के धन्धों में फसाया मुझको ॥टेक॥
मैं तो चेतन हूं निराकार सभी से न्यारा
दुष्ट भोगों ने ही कर्मों से बंधाया मुझ को ॥टेक॥
नींद गफलत से मेरी आंख कभी भी न खुली
भोग इन्द्री और विषयों ने भुलाया मुझको ॥टेक॥
ज्ञान धन मेरा हरा रूप दिखा कर अपना
जून चौरासी में भटका के रुलाया मुझको ॥टेक॥
अब न सेऊंगा कभी भूल कर इन विषयों को
'न्यायमत' जैन धर्म अब तो है पाया मुझको ॥टेक॥
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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