हे वीर तुम्हारे

हे वीर तुम्हारे


 हे वीर तुम्हारे द्वारे पर एक दरश भिखारी आया है ।

प्रभु दर्शन भिक्षा पाने को दो नयन कटोरे लाया है ॥ १

नहीं दुनियाँ में कोई मेरा है आफत ने मुझ को घेरा है ।

अब एक सहारा तेरा है जगने मुझ को ठुकराया है ॥ २

धन दौलत की कुछ चाह नहीं घरबार छुटे परवाह नहीं ।

मेरी इच्छा है तेरे दर्शन की दुनियाँ से चित घबराया है ॥ ३

मेरी बीच भूँवर में नैया है, प्रभु तू ही एक खिवैया है ।

लाखों को ज्ञान सिखा तुमने भवसिंधु से पार लगाया है ॥ ४

आपस में प्रीति व प्रेम नहीं, और तुम बिन हमको चैन नहीं ।

अब तुम ही आकर दर्शन दो 'त्रिलोकी'नाथ अकुलाया है ॥ ५

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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