प्रभु पतित पावन

 बुधजन कृत - दर्शन पाठ 


प्रभु पतित पावन मैं अपावन, चरण आयो शरण जी।

यो विरद् आप निहार स्वामी, मेटो जामन मरन जी ॥

तुम ना पिछान्यो आन मान्यो, देव विविध प्रकार जी।

या बुद्धि सेती निज न जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी ॥१॥

भव विकट बन में करम बैरी, ज्ञानधन मेरो हरयो ।

तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति धरतो फिरयो ॥

धन घड़ी यों धन दिवस योही, धन जन्म मेरो भयो ।

अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभुजी की लख लयो ॥२॥

छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा पै धरै।

वसु प्रातिहार्य अनन्त गुणयुत, कोटि रवि छवि को हरै ॥

मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आतम भयो ।

मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रङ्क चिन्तामणि लयो ॥३॥

मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक, बीनऊँ तुम चरण जी ।

सर्वोत्कृष्ट त्रिलोक पति जिन, सुनहु तारन तरन जी ॥

जाँचूं नहीं सुर वास पुनि, नर राज परिजन साथ जी ।

‘बुध’ जाँचहूँ तुम भक्ति भवभव, दीजिये शिवनाथ जी ॥४॥

( फिर लाई हुई प्रासुक सामग्री के अनुसार नीचे लिखे छन्द पढ़ कर पुंज चढ़ावे । )

चावल चढ़ाने का मंत्र

तन्दुल धवल पवित्र अति, नाम सुअक्षत तास ।

अक्षत सों प्रभु पूजिये, अक्षय गुणप्रकाश ॥

ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

 लौंग, बादाम, फल चढ़ाने का मंत्र

जो जैसी करनी करे, सो वैसा फल लेय।

फल पूजा महाराज की, निश्चय शिव फल देय ॥

ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ चढ़ाने का मंत्र

उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरु सुदीप सुधूपफलार्घकैः ।

धवलमङ्गलगानरवाकुले, जिनगृहे जिननाथमहं यजे ॥

ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म तप ज्ञान निर्वाण कल्याणक प्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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