बाबू न्यामत सिंह जैन
बाबू न्यामत सिंह जैन
जैन जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार, काव्य नाटक के शिल्पी (1866-1933) जयंती पर विशेष:-
हिसार नगर को यह गौरव प्राप्त है कि जैन जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार कवि न्यामत सिंह जैन का कार्यक्षेत्र यहां रहा है। आपका जन्म हांसी के प्रतिष्ठित दिगंबर जैन परिवार में माघ 14 संवत 1923 सन् 1866 को हुआ था। आपके पिता लाला मंगल सैन व्यवसाय से खजांची थे और सन् 1857 के गदर के समय गांव राखी से आकर हांसी में रहने लगे थे। बाबू न्यामत सिंह विद्यार्थी जीवन से ही कुशल बुद्धि के थे। आपको हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था।
वर्ष 1885 में न्यामत सिंह की नियुक्ति बतौर मुख्य लिपिक हिसार में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड में हो गई। अपनी प्रतिभा, ईमानदारी व कार्य के प्रति निष्ठा के कारण आपको शीघ्र ही सैक्रेटरी के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। यह पद उस समय बड़ी प्रतिष्ठा का पद माना जाता था क्योंकि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का चेयरमैन डिप्टी कमिश्नर हुआ करता था। बाबू न्यामतसिंह अपनी विद्वता के कारण बहुत प्रसिद्ध थे। हर काम की उन्हें पूर्ण जानकारी थी। यही कारण था कि जब भी कोई डिप्टी कमिश्नर आता था, जिले से संबंधित जानकारी इन्हीं से प्राप्त करते थे।
बाबू न्यामत सिंह ने सन् 1906 में लिखना आरंभ किया था। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि उनकी इच्छा है कि वे 100 पुस्तकों की रचना करें, परंतु वे अपने जीवन काल में 40 पुस्तकों की रचना ही कर पाए; जिनमें 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनकी रचनाओं को विषय दृष्टि से चार भागों में बांटा जा सकता है। प्रथम कविता व भजन संग्रह, 2-जैन सिद्धांत, 3-समाज सुधार व 4-काव्य नाटक। इनके काव्य नाटक जैन शास्त्रों में वर्णित कथाओं पर आधारित हैं। यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि अनेक साहित्यकारों ने नाटक तो लिखे हैं परंतु इस शताब्दी में बाबू न्यामत सिंह जैन ही काव्य-नाटकों के शिल्पी माने जाते हैं। उनके प्रसिद्ध नाटकों में सती कमलश्री नाटक, सती कुन्ती नाटक, सती तिलका सुंदरी नाटक, चिदानन्द शिव सुंदरी नाटक व सती मैनासुंदरी नाटक हैं। मैना सुंदरी नाटक आपकी प्रथम कृति थी जो वर्ष 1911 में प्रकाशित हुई। काव्य नाटक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1928 तक इस नाटक के 9 संस्करण निकल चुके थे।
आपके द्वारा रचित काव्य नाटकों की ख्याति भारत के प्रत्येक प्रांत में हुई और सभी स्थानों पर विभिन्न जैन उत्सवों व अवसरों पर उन नाटकों का आज भी मंचन किया जाता है। उनके नाटक, अभिनय, रंगमंच, कथन एवं चरित्र चित्रण की दृष्टि से अद्वितीय हैं। इनकी भाषा बहुत ही सरल रही है तथा उर्दू भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है क्योंकि उर्दू भाषा उस समय जन साधारण की भाषा मानी जाती थी। परंतु हिन्दी भाषा की भी प्रमुखता है। गद्य व पद्य दोनों विधाओं में रचित इन नाटकों में गजल छंद का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। इसलिए कहा जा सकता है कि बाबू न्यामत सिंह जैन ने सन् 1906 से ही हिन्दी में गजल छंद में लिखने की नींव रख दी थी। ‘बाबू न्यामत सिंह जैन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ विश्वविद्यालय से एक लघु शोध भी स्वीकृत हो चुका है तथा पी.एच.डी. के लिए भी शोध हो चुका है।
बाबू न्यामत सिंह का निधन 67 वर्ष की आयु में दिनांक 9 दिसंबर, 1933 को हुआ। उनकी अनेक रचनाएँ अधूरी रह गईं। उनके छोटे पुत्र राज कुमार जैन जी में भी लेखन के सभी गुण विद्यमान थे। राज कुमार जैन जी ने बाबू न्यामत सिंह रचित नाटक सती विजया सुन्दरी नाटक, जो अधूरा रह गया था, सर्वप्रथम उसे पूरा किया और इस प्रकार बाण भट्ट की परिपाटी को निभाया। इसके अतिरिक्त 10 अन्य काव्य नाटक भी लिखे जिनमें सती चन्दनबाला नाटक, सती सुर सुन्दरी नाटक, महाबीर चरित्र, पदमपुरी चरित्र, प्रहलाद नाटक, महावीर चांदंन पुर गांव नाटक आदि प्रसिद्ध कृतियां हैं।
बाबू न्यामत सिंह जैन की सुपौत्री (स्वर्गीय) राजबाला बिंदल (जैन) दिल्ली, एम.ए. हिंदी व इतिहास, बी.एड. जो एक सितम्बर 1965 से 1983 तक हरियाणा में शिक्षिका रहीं व 1983 से 2009 तक दिल्ली में शिक्षिका रहीं, अन्त में भारत गौरव पूज्य गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माता जी के संघ में क्षुल्लिका बनीं। प्रपौत्री रेणू जैन (स्वीटी) मेरठ तीन प्रतिमाधारी हैं। सुपौत्री चंदन बाला जैन भी हिसार (हरियाणा) की सुप्रसिद्ध कवयित्री रही हैं तथा उनके सुपौत्र वरिष्ठ कवि एवं गजलकार, चंदन बाला साहित्यिक मंच हिसार के अध्यक्ष, महेंन्द्र जैन आज भी अपने परिवार की साहित्यिक धरोहर का पोषण कर रहे हैं।
बाबू जी का परिवार व हिसार के अन्य साहित्यकार हर वर्ष बाबू जी की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाते हैं।
जिनवाणी में संगृहीत ‘बाबू न्यामत सिंह जैन’ रचित भजन (सम्बोधन)
सदा सन्तोष कर प्राणी, अगर सुख से रहा चाहे,
घटा दे मन की तृष्णा को, अगर अपना भला चाहे।
आग में जिस कदर ईंधन, पड़ेगा ज्योति ऊँची हो,
बढ़ा मत लोभ की तृष्णा, अगर दुःख से बचा चाहे।
दुःखी रहते हैं वह निशदिन, जो आरत-ध्यान करते हैं,
न कर लालच अगर आज़ाद, रहने का मजा चाहे।
बिना मांगे मिले मोती, ए न्यामत देख दुनियाँ में,
भीख मांगें नहीं मिलती, अगर कोई गहा चाहे।
चंदनबाला जैन साहित्यिक मंच, हिसार परिवार के सदस्यों द्वारा भावपूर्ण श्रद्धांजलि
जब हिसार के मरुस्थल में इक फूल खिला, जैन जगत को न्यामत सिंह उपहार मिला।
उनकी लेखनी से ही पूरे देश में, काव्य नाटकों का भी चल पड़ा सिलसिला - हरियाणा राज्य कवि उदयभानु हंस
कविवर बाबू न्यामत सिंह जैन उच्च कोटि विद्वान थे मानवता के सच्चे साधक, नाटककार महान थे।
अब तक नाम अमर है उनका जैन धर्म संसार में, रोशन है साहित्यदीप अभी उनके परिवार में। -
महेंद्र जैन, अध्यक्ष, चंदनबाला जैन साहित्यिक मंच हिसार, सुपौत्र बाबू न्यामत सिंह
णमोकार महामंत्र
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्वसाहूणं
ऐसो पंच णमोकारो, सव्व पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलम्।।
स्वतंत्र भटनागर (जैन) (स्वर्गीय)
एसोसिएट प्रोफेसर (सेवानिवृत्त) टोहाना, जिला फतेहाबाद, हरियाणा, सुपौत्री बाबू न्यामत सिंह जैन
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
प्रपौत्री बाबू न्यामत सिंह जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद
Comments
Post a Comment