बैठ अकेला

 भजन


बैठ अकेला दो घड़ी तू, कभी तो प्रभु को ध्याया कर, 

मन मन्दिर  में गाफिला तू ,झाड़ू रोज लगाया कर। 

सोने में तूने रैन गंवाई,  दिन भर करता पाप रहा, 

उसी तरह बरबाद तू प्राणी करता अपना आप रहा। 

बिस्तर से उठ प्रेमियां सत्संग में भी जाया कर—टेक 

बार बार नर तन का पाना, बच्चों वाला खेल नहीं, 

जन्म जन्म के शुभ कर्मों का, जब तक होता मेल नहीं। 

नर तन पाने के लिए कुछ, उत्तम कर्म कमाया कर—टेक 

पास तेरे हैं दुखिया कोई, तू ने मौज उड़ाई क्या।:

भूखा प्यासा पड़ा पड़ोसी, तू ने रोटी खाई क्या। 

पहले सब को पूछ कर, तू पीछे खुद खाया कर—टेक 

देख दया सर्वज्ञ देव की, जिन्होंने ऐसा ज्ञान दिया 

सद्गुरु की सुन कर वाणी को, तेरा नहीं अभिमान गया। 

सिद्ध इसी का नाम है तू, प्रातः समय में गाया कर—टेक

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

मेरी भावना (2) बुद्ध किसे कहते हैं?

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)