तपस्वी का वंदन

तपस्वी का वंदन




धन्य-धन्य हे संयमी आत्मन्, तुमने जग को बिसराया है,

नश्वर काया की मोह-नींद से, निज चेतन को जगाया है।

कठिन राह पर कदम बढ़ाकर, तुमने अपनी राह चुनी,

वंदन है उस महापुरुष को, जो बन गया आत्म-गुणी।

भूख-प्यास और सुख-साधन को, तुमने पल में त्याग दिया,

निज स्वभाव में लीन रहे तुम, अंतर का अनुराग जिया।

काया को तपाया कंचन सा, कर्मों का बंधन तोड़ने को,

छोड़ चले संसार की माया, शिव-पथ से नाता जोड़ने को।

साधना तुम्हारी अनुपम है, यह मार्ग नहीं है कायर का, 

वीर पुरुष ही सह सकते हैं, प्रहार मोह और माया  का।

शांत भाव और क्षमा हृदय में, समता का रस घोला है, 

ज्ञान-ध्यान की पावन लौ में, अंतर-पट को खोला है।

तप की महिमा अपरम्पार है, देव भी शीश झुकाते हैं, 

तुच्छ है जग का वैभव सारा, सब हाथ जोड़ हर्षाते हैं।

कोटि-कोटि अनुमोदना तुम्हारी, बारम्बार प्रणाम प्रभु, 

तप की इस पावन धारा से, पावन होवे सारा भू।

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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