ये व्यर्थ नर

 **भजन** - ये व्यर्थ नर



*(चाल—ये जिन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया)*

ये व्यर्थ नर जन्म तेरा, इस जगत में हो गया, 

भोग ही में खो गया .......

है अमोल ये रतन नर जनम जहान में, 

है भोग कांच के समान, जान ले तू ज्ञान में ---

क्यों काँच बदले खो रहा, मूढ़ ये रतन महान—टेक 

है विषय में सुख नहीं, दुःख ही महान है, 

सरसों समान सुख अगर, तो कष्ट मेरु मान है, 

भोगों में चित्त न लगा, जो चाहता है निज भला—टेक 

हाथी व मीन और भ्रमर, तथा पतंग और हिरण, 

एक एक विषय के वश, इनका हुआ है मरण, 

पाँचों के जो वश भये, भगवान उनकी क्या दशा—टेक

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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