जीवन है पानी की बूंद (31-35)

जीवन है पानी की बूंद (31-35)

रचयिता व प्रणेता :


परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज


जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।

होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥

 दुःख में ही सुख छाया है, ऋषियों ने बतलाया है,

ये चिन्तन की माया है-2

दुःख में से सुख निकलेगा, कभी न फिर दुख मचलेगा,

सुख बिन ये जीवन, हो ऽऽ....,

सुख बिन ये जीवन दुःख दर्द बनाये रे....जीवन (31)

पहले खूब कमाते धन, दिखता नहीं रात और दिन,

चुक जाता सब चैन अमन-2

जब चुक जाता तन और मन, याद तभी आते भगवन,

ऐसे लोगों को, हो ऽऽ.....,

ऐसे लोगों को सत्पथ दिखलाये रे....जीवन (32)

दुःख के बाद मिलेगा सुख, पहले दुःख में खोजो सुख,

बदलो अपने दिल का रुख-2

दुःख सुख ले कर आता है, फिर भी तू घबराता है,

दुःख के आंगन में, हो ऽऽ....,

दुःख के आंगन में अच्छे गुल आएं रे....जीवन (33)

दुःख मांगो दुःख जायेगा, सुख मांगो दुःख आयेगा,

हिम्मत जो दिखलायेगा-2

ऊंची भरे उड़ान यहां, गिरने का फिर काम कहां

दिल हो वैसा ही, हो ऽऽ....,

दिल हो वैसा ही ये मन हो जाये रे....जीवन (34)

धन की खातिर जीता है, धर्म कर्म से रीता है,

वो ही मदिरा पीता है-2

धर्म हृदय जो लाता है, वो जग में सब पाता है,

धर्मी को यारों, हो ऽऽ....,

धर्मी को यारों सब कुछ मिल जाये रे...जीवन (35)



। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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