जीवन है पानी की बूंद (101-105)
जीवन है पानी की बूंद (101-105)
रचयिता व प्रणेता :
जीवन है पानी की बूंद कब मिट जाए रे
होनी अनहोनी कब क्या घट जाए रे।।
पढ़ा न जरा विचारा है, खुद को नहीं सुधारा है।
खुद को नहीं सुधारा है, इसीलिए अंधियारा है।।
इसीलिए अँधियारा है, दिल में नहीं उतारा है।
खुद को ही पढ़ ले, हो ऽऽ....,
खुद को ही पढ़ ले, सब कुछ पढ़ जाए रे ।।101।। जीवन है.....
करना है वो आज करें , कल पर मत विश्वास करें।
कल पर मत विश्वास करें, आज करें वो अभी करें।।
कल को किस ने देखा है, कल का नहीं भरोसा हैं।
कल-कल करके तू, हो ऽऽ....,
कल-कल करके तू, क्यों अकल गंवाये रे।।102।। जीवन है......
साथ निभायेगा बेटा, सोच रहा लेटा-लेटा।
हाय बुढ़ापा आयेगा पास न आयेगा बेटा।
ख्वाबों में तू क्यों, हो ऽऽ....,
ख्वाबों में तू क्यों, आनन्द मनाये रे ।।103।।जीवन है......
अर्द्धमृतक समवृद्धापन, झुकी कमर सिकुड़न-सिकुड़न|
गोदी में पोता-पोती, खोज रहा बचपन यौवन|
बीते जीवन के, हो ऽऽ....,
बीते जीवन के, तू गीत सुनाये रे ।।104।।जीवन है......
हाथों में लकड़ी थामी, चाल हो गई मस्तानी।
यम के घर खुद जाने की, जैसे मन में हो ठानी।
बेटा बहू सोचें, हो ऽऽ....,
बेटा बहू सोचें, डोकरो कब मर जाये रे।।105 ।।जीवन है......
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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