जीवन है पानी की बूंद (11-15)
जीवन है पानी की बूंद (11-15)
रचयिता व प्रणेता :
परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज
जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।
होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥
संयम सुन्दर गहना है,
गुणी जनों ने पहना है,
मुनि जनों का कहना है - 2
मन इन्द्रिय का रोध करे, अन्तर जीवन शोध करे,
संयम सुंदर-सा, हो ऽऽ....,
संयम सुंदर-सा जिन ध्यान कराये रे.... जीवन.....(11)
जन्म सभी को मिलता है, दीया किसी का जलता है,
मार्ग किसी को मिलता है - 2
जन्म मिला पर धर्म नहीं, तो फिर अच्छा कर्म नहीं,
धर्म से जीवन, हो ऽऽ....,
धर्म से जीवन सब कुछ पा जाये रे.... जीवन (12)
किसका कितना तोड़ यहाँ, किसका कितना जोड़ यहाँ,
किसका कितना ठौर यहाँ - 2
धन दौलत में सार नहीं, इसमें भव का पार नहीं,
जीवन पाकर के, हो ऽऽ....,
जीवन पाकर के निज का ज्ञान बढ़ाओ रे.... जीवन(13)
कितनी चादर (कफन) ओढ़ी है, कितनी मटकी फोड़ी है,
कितनी माला तोड़ी है - 2
कितनी गहरी छोड़ी है, फिर भी लगती थोड़ी है,
जब भी जानेगा, हो ऽऽ....,
जब भी जानेगा, तब खुद पछताये रे.... जीवन(14)
पिता समझता फर्ज जिसे, बेटा जाने कर्ज उसे,
देखो कितना फर्क दिखे - 2
मात पिता को खुश रखना, ऐसा फर्ज अदा करना,
तब ही खुशहाली, हो ऽऽ...,
तब ही खुशहाली घर में आ पाये रे.... जीवन(15)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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