जीवन है पानी की बूंद (36-40)
जीवन है पानी की बूंद (36-40)
रचयिता व प्रणेता :
परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज
जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।
होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥
मनी (Money) बिगाड़े सब के मन, स्वस्थमयी सुंदर ये तन,
यौवन, बचपन, बूढ़ापन-2
मनी बिना मन महारतन, मनी बिना मन करे यतन,
मन हो गर मौनी, हो ऽऽ....,
मन हो गर मौनी तो मनी है पाये रे....जीवन (36)
आदत का रंग चढ़ जाये, मुश्किल से वह धुल पाये,
कई जिन्दगी दुःख पाये-2
संस्कार की चादर लो, कर्त्तव्यों का रंग घोलो,
धीरे-धीरे तब, हो ऽऽ....,
धीरे-धीरे तब आदत मिट पाये रे...जीवन (37)
दुनिया ठेलम ठेला है, ये संसार झमेला है,
चलना तुझे अकेला है-2
इक दो पल का खेला है, भोग विषय का मेला है,
देखो इनको पर, हो ऽऽ....,
देखो इनको पर नहीं अपना बताओ रे....जीवन (38)
खुद को नहीं तराशा है, खुद में नहीं तलाशा है,
आकर बने तमाशा है-2
आपा पर नहीं भासा है, पर पर फेंका पासा है,
जीवन की ज्योति, हो ऽऽ....,
जीवन की ज्योति अब जल्द जलाओ रे....जीवन (39)
खुद की नहीं तलाश यहां,
खुद हम जिंदा लाश यहां, ऐसा हो अहसास यहां-2
हर दम रहे कयास यहां, जीवन की है प्यास यहां,
जाने जीवन की हो ऽऽ....,
जाने जीवन की कब संध्या हो जाये रे....जीवन (40)
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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