जीवन है पानी की बूंद (96-100)

जीवन है पानी की बूंद (96-100)

रचयिता व प्रणेता :

परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज

जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।

होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥ 

 खुद का अनुसंधान करो, जिन गुरु का सम्मान करो,

खुश हो पूजा ध्यान करो-2

जो चाहो मिल जायेगा, इक दीपक जल जायेगा,

अपने आंगन की, हो ऽऽ....,

अपने आंगन की तुम नींव धराओ रे.... जीवन (96)

निज से स्वयं मिलाते हैं, खुद से खुद को समझाते हैं,

वे गुरुवर कहलाते हैं-2

आशीष देकर जाते हैं, वहां खुशी बरसाते हैं,

गुरु का आशीष, हो....,

गुरु का आशीष भव पार कराये रे.... जीवन (97)

जिनके यहां उजाले हैं, उनके प्रभु रखवाले हैं,

वे सच्चे दिल वाले हैं-2

जो विष-भोग को टाले हैं, वे अमृत के प्याले हैं,

खुद को ही जानो, हो....,

खुद को ही जानो तो प्रभु मिल जाये रे.... जीवन (98)

अच्छे करे विचार यहां, तो अच्छा आचार यहां,

संस्कार शुभ बने यहां-2

अच्छे से अच्छा होता, जीवन भी सच्चा होता

अच्छा जो सोचे, हो....,

अच्छा जो सोचे वो सब कुछ पाये रे.... जीवन (99)

ओंकार कर वाणी में, प्रीति बढ़े हर प्राणी में,

यही कहा जिनवाणी में-2

फूल झरें गर वाणी में, अमृत घुले कहानी में,

वाणी व्यक्ति को, हो....,

वाणी व्यक्ति को गुणवान बनाये रे.... जीवन (100)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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