भक्तामर है प्यारा स्तोत्र (1-4)
भक्तामर है प्यारा स्तोत्र
भक्तामर है प्यारा स्तोत्र, मुक्ति का मार्ग दिखाए रे...
प्रभु आदिनाथ का ध्यान करो, भव संकट दूर हो जाए रे...
(श्लोक 1)
नतमस्तक होकर देव सभी, चरणों में शीश झुकाते हैं,
निकली किरणों की आभा से, पाप अंधियारे मिट जाते हैं।
जो जग के तारणहारे हैं, जो आदिदेव कहलाते हैं,
उन ऋषभदेव के चरणों में, हम भक्ति के अर्घ चढ़ाते हैं...
भक्तों के संकट, हो ऽऽ......
भक्तों के संकट, सारे कट जाएं रे, प्रभु आदिनाथ का ध्यान करो...
(श्लोक 2)
हे देव! तुम्हारी स्तुति को, बुद्धिमानी जन हैं कर पाते,
इन्द्रों के अधिपति भी प्रभुवर! महिमा गाते हैं थक जाते।
फिर मुझ-सा मन्द बुद्धि प्राणी, कैसे गुणगान तुम्हारा करे,
जैसे सागर को पार करे, कोई लघु नौका का साथ धरे...
अज्ञान अंधेरा हो ऽऽ......
सब छंट जाए रे, प्रभु आदिनाथ का ध्यान करो...
(श्लोक 3)
अल्पश्रुत होकर भी प्रभुवर, मैं स्तुति करने आया हूँ,
जैसे जल में पड़े चन्द्र को, बालक पाने ललचाया हूँ।
पर भक्ति भाव के वश होकर, मन को न रोक मैं पाया हूँ,
संसार के सारे बंधनों से, मुक्ति की आशा लाया हूँ...
बेड़ी भी पल में, हो ऽऽ......
वह टूट जाए रे, प्रभु आदिनाथ का ध्यान करो...
(श्लोक 4)
हे प्रभु! आपके गुण इतने, कैसे कोई वर्णन कर पाए,
संसार के सारे सागर का, जल घट में क्या वो समा पाए?
पर फिर भी श्रद्धा उमड़ी है, वाणी को सुर मिल जाते हैं,
भक्ति की छोटी-सी लौ से, पापों के पर्वत ढह जाते हैं...
मन का उपवन, हो ऽऽ......
खिल खिल जाए रे, प्रभु आदिनाथ का ध्यान करो...
। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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