जीवन है पानी की बूंद (111-115)
जीवन है पानी की बूंद (111-115)
रचयिता व प्रणेता :
परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज
जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।
होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥
सोचें वैसा हो जाए, जैसा चाहें मिल जाए
देर नहीं लगने पाए - 2
चाहते ऐसा है सब ही, ऐसा होता कभी - 2,
किस्मत हो अच्छी, हो ऽऽ....
किस्मत हो अच्छी, तो झट हो जाए रे ।।111।। जीवन है.....
करना पूजन दान यहां, गुरुओं का सम्मान यहां
जिनवर का गुणगान यहां - 2,
इन सबसे मन पावन हो, हृदय साफ मन भावन हो
मन की निर्मलता,हो ऽऽ....
मन की निर्मलता, निज सार दिखाये रे।।112 ।। जीवन है .... ज्ञान जिसे नहीं हो पाये, कहीं नहीं वह सुख पाये
दु:ख से उबर नहीं पाये - 2
ज्ञान करे भव पार यहां, देता जीवन सार यहां
ज्ञान की महिमा, हो ऽऽ....
ज्ञान की महिमा, सब वेद सुनाये रे ।।113 ।। जीवन है .... ताक़त को बर्बाद किया, खुद को नहीं आबाद किया
कैसे हो आज़ाद, यहां - 2,
गुलामियत में रहते हैं, खुशी -खुशी गम सहते हैं,
अपना घर भूले, हो ऽऽ....
अपना घर भूले, पर में भरमाये रे।।114।। जीवन है ....
मानव जीवन सार यहां, शिवपुर का आधार यहां
इसके बिन संसार यहां - 2
सार करे भव पार यहां, धर्म सार का यार यहां
सार बिन इंसा, हो ऽऽ....
सार बिन इंसा, भव भ्रमण बढ़ाये रे।।115 ।। जीवन है ....
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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